Wednesday, September 16, 2026
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सीएमडी हरीश दुहन की कलम से: ऊर्जा सुरक्षा से जनकल्याण तक, एसईसीएल के बदलाव की कहानी

वर्ष 2014 के बाद एसईसीएल में आया बदलाव उत्पादन बढ़ने के साथ कार्यक्षमता, तकनीक और जिम्मेदारी के विस्तार की कहानी भी है।

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किसी देश के विकास की रफ्तार उसकी ऊर्जा की उपलब्धता और विश्वसनीयता से गहराई से जुड़ी होती है। कारखानों का संचालन हो, खेतों तक सिंचाई की सुविधा पहुंचाना हो या घरों को रोशन करना, हर जगह ऊर्जा की जरूरत है। भारत जैसे विशाल और तेजी से आगे बढ़ते देश के लिए यह जरूरत और भी महत्वपूर्ण है। आज भी देश के करीब 73 प्रतिशत बिजली उत्पादन का आधार कोयला है। इसलिए कोयला क्षेत्र में होने वाला हर सकारात्मक बदलाव देश की ऊर्जा सुरक्षा और आम लोगों के जीवन पर असर डालता है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2014 के बाद कोयला क्षेत्र में व्यापक नीतिगत और संरचनात्मक सुधार हुए हैं। पारदर्शिता बढ़ाने, निर्णय प्रक्रिया तेज करने, आधुनिक तकनीक अपनाने और बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने के प्रयासों ने इस क्षेत्र को नई दिशा दी है। खदानों की योजना से लेकर कोयले की ढुलाई तक, कामकाज के अनेक स्तरों पर इसका असर दिखाई देता है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का घरेलू कोयला उत्पादन लगातार दूसरे वर्ष एक अरब टन के पार पहुंचा। प्राथमिक आंकड़ों के अनुसार, इस दौरान 1.04 अरब टन कोयले का उत्पादन हुआ।
इस राष्ट्रीय उपलब्धि में साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड यानी एसईसीएल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कार्यरत कोल इंडिया की इस मिनीरत्न कंपनी ने अपनी स्थापना के वर्ष 1985-86 में 3.42 करोड़ टन कोयले का उत्पादन किया था। वित्त वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 17.628 करोड़ टन हो गया। आज कोल इंडिया के उत्पादन में एसईसीएल की हिस्सेदारी करीब 23 प्रतिशत और देश के कुल कोयला उत्पादन में लगभग 17 प्रतिशत है। इस सफर के पीछे 36 हजार से अधिक नियमित कर्मचारियों, 24 हजार संविदा कामगारों और बड़ी संख्या में जुड़े व्यवसायकर्ता, सप्लायर्स तथा सर्विस प्रोवाइडर्स का योगदान है।

वर्ष 2014 के बाद एसईसीएल में आया बदलाव उत्पादन बढ़ने के साथ कार्यक्षमता, तकनीक और जिम्मेदारी के विस्तार की कहानी भी है। वर्ष 2013-14 में कंपनी का कोयला उत्पादन 12.426 करोड़ टन था, जो 2025-26 में बढ़कर 17.628 करोड़ टन हो गया। इसी अवधि में उपभोक्ताओं को कोयले की आपूर्ति 12.203 करोड़ टन से बढ़कर 17.863 करोड़ टन पहुंच गई। यह 46 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि है। कंपनी आज 13 राज्यों को कोयले की आपूर्ति कर रही है। इससे भी उल्लेखनीय बदलाव उत्पादकता(ओएमएस ) में आया है। प्रति श्रमिक, प्रति पाली उत्पादन 7.23 टन से बढ़कर 16.47 टन हो गया है। यानी उपलब्ध श्रमशक्ति की उत्पादकता दोगुने से भी अधिक हुई है।

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इस क्षमता के केंद्र में कोरबा की गेवरा, कुसमुंडा और दीपका जैसी विशाल खदानें हैं। इन तीनों की सम्मिलित क्षमता 18.5 करोड़ टन है। कोयला खनन और बिजली उत्पादन के इस बड़े केंद्र को देश की ऊर्जा राजधानी कहे जाने का आधार भी यही है। लेकिन खदान में कोयला निकालना जिम्मेदारी का एक हिस्सा है। उसे समय पर बिजलीघरों और अन्य उपभोक्ताओं तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।

इसी उद्देश्य से एसईसीएल, इरकॉन और छत्तीसगढ़ सरकार के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ ईस्ट रेल तथा ईस्ट-वेस्ट रेल कॉरिडोर विकसित कर रही है। करीब 13,685 करोड़ रुपये के निवेश वाली इन परियोजनाओं में लगभग 342.6 किलोमीटर रेल लाइनें शामिल हैं। ये रेल संपर्क मांड-रायगढ़ और कोरबा कोयला क्षेत्रों के दूरस्थ हिस्सों को राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जोड़ रहे हैं। इनसे माल परिवहन को गति मिलने के साथ भविष्य में स्थानीय लोगों की आवाजाही के लिए भी नए अवसर बनेंगे।

कोयले की ढुलाई को अधिक व्यवस्थित और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए लगभग 2,700 करोड़ रुपये की लागत से 11 फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी परियोजनाएं चालू की गई हैं। इनकी कुल वार्षिक क्षमता 15.6 करोड़ टन है। इनके जरिए कोयले को मशीनों और कन्वेयर सिस्टम्स की मदद से लोडिंग स्थल तक पहुंचाया जाता है, जिससे ढुलाई से जुड़े कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलती है। सात और परियोजनाओं से सालाना 8.5 करोड़ टन की अतिरिक्त मशीनीकृत लोडिंग क्षमता जोड़ने की योजना है। वर्ष 2025-26 में इन प्रणालियों से कोयले की आपूर्ति में 28 प्रतिशत वृद्धि हुई और कुल आपूर्ति में इनकी हिस्सेदारी 41.3 प्रतिशत रही।

खदानों के भीतर भी काम करने की टेक्नोलॉजी बदल रही हैं। एसईसीएल में 88 प्रतिशत से अधिक कोयले का उत्पादन सरफेस माइनर से हो रहा है। इस तकनीक में परंपरागत ड्रिलिंग और विस्फोट की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे उनसे पैदा होने वाली धूल और कंपन कम होते हैं। भूमिगत खदानों में कंटीन्यूअस माइनर जैसी मशीनें बड़े पैमाने पर उत्पादन का आधार बन रही हैं। कंपनी के भूमिगत कोयला उत्पादन में इनका योगदान 76 प्रतिशत है।

सिंघाली भूमिगत खदान में नई पेस्ट फिल तकनीक इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इसमें खनन के बाद खाली हुई जगह को विशेष रूप से तैयार मिश्रण से भरा जाता है। इसका उद्देश्य भूमिगत स्थिरता बढ़ाना और ऐसे भूभाग के नीचे भी खनन की संभावना विकसित करना है, जहां सतह की परिस्थितियों के कारण परंपरागत खनन सीमित हो जाता है। माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर तथा रेवेन्यू शेयरिंग जैसी व्यवस्थाओं से संसाधनों के विकास और विशेषज्ञ क्षमताओं के उपयोग के नए रास्ते भी खुल रहे हैं।

तकनीक की उपयोगिता उत्पादन के साथ निगरानी, सुरक्षा और जवाबदेही में भी है। एसईसीएल की डिजिकोल पहल मशीनों की निगरानी, ड्रोन सर्वेक्षण, वीडियो विश्लेषण और कामगारों की सुरक्षा से जुड़े डिजिटल उपायों को एक साथ लाती है। फरवरी 2026 में केंद्रीय सतर्कता आयोग की राष्ट्रीय कार्यशाला में इसकी प्रस्तुति ने पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने में डिजिटल प्रणालियों की भूमिका को भी सामने रखा। खदानों, रेलवे साइडिंग और कोयला प्रेषण स्थलों पर 1,600 से अधिक सीसीटीवी कैमरों का नेटवर्क तैयार किया गया है। अगले चरण में निगरानी को और प्रभावी बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित विश्लेषण की योजना है।

हमारे लिए आधुनिकीकरण का एक महत्वपूर्ण अर्थ कर्मचारियों के लिए नए अवसर खोलना भी है। एसईसीएल प्रबंधन की पहल ‘धराशक्ति’ महिला कर्मचारियों को तकनीकी और खदान संचालन से जुड़ी भूमिकाओं के लिए तैयार कर रही है। इसमें भारी मशीनों के संचालन का प्रशिक्षण भी शामिल है। भूमि के बदले तथा आश्रित श्रेणी में नौकरी पाने वाली महिलाओं को उनकी शिक्षा और क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ने का अवसर देना इसका प्रमुख उद्देश्य है। इसके तहत 19 महिलाओं का एक समूह एडवांस सिम्युलेटर की मदद से भारी मशीनों के संचालन का प्रशिक्षण ले रहा है। इससे उन कार्यों में महिलाओं की भागीदारी का रास्ता खुल रहा है, जहां उनकी उपस्थिति परंपरागत रूप से सीमित रही है।

इसी सोच के साथ बिलासपुर के वसंत विहार में कोल इंडिया की पहली पूर्णतः महिला संचालित डिस्पेंसरी और कोरबा की केंद्रीय कार्यशाला में पहली पूर्णतः महिला संचालित सेंट्रल स्टोर यूनिट स्थापित की गई है। ये पहल बताती हैं कि अवसर और प्रशिक्षण मिलने पर महिलाएं खनन उद्योग की विविध जिम्मेदारियां सफलतापूर्वक संभाल सकती हैं।

बढ़ती परिचालन क्षमता के साथ कंपनी की वित्तीय स्थिति भी मजबूत हुई है। मार्च 2015 में एसईसीएल की नेटवर्थ करीब 9,544 करोड़ रुपये थी, जो मार्च 2026 में बढ़कर 20,457 करोड़ रुपये हो गई। यह लगभग 114 प्रतिशत की वृद्धि है। वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने प्रत्यक्ष कर, रॉयल्टी तथा अन्य करों और शुल्कों के रूप में केंद्र व राज्य सरकारों के खजाने में करीब 11,830 करोड़ रुपये का योगदान दिया। अकेले रॉयल्टी का भुगतान 2014-15 के लगभग 2,075 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 3,485 करोड़ रुपये पहुंच गया। सार्वजनिक राजस्व में यह योगदान कोयले की आपूर्ति और रोजगार से आगे कंपनी की व्यापक आर्थिक भूमिका को रेखांकित करता है।

किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम की प्रगति का महत्व तब और बढ़ता है, जब उसका लाभ आसपास के समाज तक पहुंचे। एसईसीएल की सामाजिक जिम्मेदारी की यात्रा भी बुनियादी सुविधाओं के निर्माण से आगे बढ़कर शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और आजीविका में स्थायी बदलाव लाने की दिशा में बढ़ी है। कंपनी का सीएसआर व्यय 2013-14 के 43.91 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 127 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। वर्ष 2014-15 से कंपनी खनन प्रभावित समुदायों पर करीब 1,078 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। इसके केंद्र में स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, ग्रामीण बुनियादी सुविधाएं, जल संरक्षण और समाज के वंचित वर्गों तक अवसर पहुंचाना रहा है। इसी अवधि में अगस्त 2026 तक भूमि के बदले 5,405 लोगों को रोजगार भी दिया गया है।

विकास का मानवीय अर्थ ‘एसईसीएल के सुश्रुत’ जैसी पहल में साफ दिखाई देता है। वर्ष 2023 में शुरू की गई यह योजना कंपनी के कार्यक्षेत्र के मेधावी विद्यार्थियों को नीट की निःशुल्क आवासीय कोचिंग उपलब्ध कराती है। रहने और भोजन की व्यवस्था भी इसमें शामिल है। पहले दो बैच के 80 विद्यार्थियों में से 70 ने नीट में सफलता हासिल की और एमबीबीएस, डेंटल कोर्स, आयुर्वेद, फिजियोथेरेपी तथा वेटेनरी कोर्स जैसे पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाया। यह भारत सरकार के डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी पोर्टल पर दर्ज होने वाली किसी कोयला सार्वजनिक उपक्रम की पहली सीएसआर योजना भी है। इससे लाभ पहुंचाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही को बल मिलता है।

इसी तरह ‘एसईसीएल की धड़कन’ जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित बच्चों के निःशुल्क ऑपरेशन की व्यवस्था कर रही है। इस पहल के तहत 300 बच्चों की सर्जरी हो चुकी है और 1,060 सर्जरी के लक्ष्य की ओर काम आगे बढ़ रहा है। किसी परिवार के लिए बच्चे का सफल इलाज एक नई उम्मीद और उसके भविष्य को सुरक्षित करने का अवसर होता है।

खनन की जिम्मेदारी उस समय भी बनी रहती है, जब किसी खदान से उत्पादन बंद हो जाता है। भूमि को सुरक्षित बनाना और उसे स्थानीय समाज के लिए फिर उपयोगी बनाना इस जिम्मेदारी का जरूरी हिस्सा है। अगस्त 2026 तक एसईसीएल ने 28 परित्यक्त खदानों का वैज्ञानिक तरीके से क्लोजर किया है, जो कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनियों में सर्वाधिक है। खनन के बाद भूमि का अगला उपयोग क्या होगा, यह अब हमारी योजनाओं का महत्वपूर्ण विषय है।

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में बिश्रामपुर के पास केनापारा इको पार्क इसका उदाहरण है। कभी खनन के लिए इस्तेमाल हुआ यह क्षेत्र आज पर्यटन और स्थानीय उद्यम के अवसर पैदा कर रहा है। कोरबा की बांकी 7 एवं 8 भूमिगत खदान की भूमि पर स्वास्थ्य केंद्र और साप्ताहिक बाजार संचालित हो रहे हैं। इन प्रयासों का संदेश स्पष्ट है—खनन समाप्त होने के बाद भी वह स्थान आसपास के लोगों के जीवन में उपयोगी भूमिका निभा सकता है।
पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी प्रयास बढ़े हैं। वर्ष 2025-26 में एसईसीएल ने 571 हेक्टेयर में अब तक के सर्वाधिक 14.36 लाख पौधे लगाए, जबकि वर्ष 2014 में यह संख्या लगभग पांच लाख थी। इनमें मियावाकी पद्धति से सघन पौधारोपण भी शामिल है। खदानों के पानी के पुनः उपयोग से 3,800 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सिंचाई को सहारा मिला है। वहीं सौर ऊर्जा परियोजनाएं खनन भूमि के उपयोग की नई संभावनाएं खोल रही हैं। वर्ष 2014 में कंपनी की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता शून्य थी, जो अब 44 मेगावाट तक पहुंच गई है।

भारत पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा के साथ आगे बढ़ रहा है। इसके लिए विश्वसनीय और किफायती ऊर्जा की निरंतर उपलब्धता जरूरी है। नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के साथ कोयला आधारित बिजली की स्थिर आपूर्ति भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। इस जरूरत को पूरा करने में एसईसीएल की भूमिका आने वाले वर्षों में और व्यापक होगी। कोरबा के साथ मांड-रायगढ़ कोयला क्षेत्र भी बढ़ते रेल संपर्क के सहारे एक अतिरिक्त उत्पादन केंद्र के रूप में उभर रहा है।

वर्ष 2014 के बाद एसईसीएल की यात्रा यह दिखाती है कि स्पष्ट नीतिगत दिशा, संस्थागत प्रतिबद्धता और कर्मचारियों की क्षमता मिलकर कितना बड़ा बदलाव ला सकती हैं। बढ़ा हुआ उत्पादन, बेहतर उत्पादकता, मजबूत वित्तीय आधार, आधुनिक परिवहन व्यवस्था और सामाजिक विकास के प्रयास इसी बदलाव के अलग-अलग पक्ष हैं। आगे हमारी जिम्मेदारी है कि हम अधिक दक्षता और जवाबदेही के साथ देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी करें तथा विकास का लाभ कर्मचारियों, स्थानीय समुदायों और उपभोक्ताओं तक पहुंचाएं। एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के रूप में हमारी सफलता की सबसे सार्थक कसौटी भी यही है।

हरीश दुहन
अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक, साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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