Sunday, November 8, 2026
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जंगलों से नक्सलवाद खत्म, अब ‘दिमागी नक्सलियों’ की पहचान होगी? बस्तर से मोदी का सियासी संदेश

यह टिप्पणी केवल सुरक्षा व्यवस्था की चर्चा नहीं थी, बल्कि पिछली सरकारों की नक्सलवाद के खिलाफ नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सीधा हमला भी थी

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रायपुर । IndustrialPunch : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीपावली के दिन छत्तीसगढ़ के बस्तर स्थित करनपुर में सुरक्षा बलों के जवानों के साथ त्योहार मनाया। लेकिन इस दौरे का सबसे अधिक राजनीतिक और वैचारिक चर्चा वाला हिस्सा उनका वह संबोधन रहा, जिसमें उन्होंने नक्सली हमलों में जवानों की शहादत का जिक्र करते हुए कहा कि महलों में रहने वाले ‘नामदारों’ की आंखों से कभी आंसू नहीं निकले। इसके साथ ही उन्होंने ‘दिमागी नक्सलियों’ की पहचान करने और उन्हें परास्त करने की बात कही।

प्रधानमंत्री के इन बयानों ने एक नई बहस को जन्म दिया है। सवाल यह है कि जब सरकार नक्सली हिंसा के अंत और प्रभावित जिलों में सुरक्षा की स्थिति में सुधार का दावा कर रही है, तब ‘दिमागी नक्सलियों’ की बात करने के पीछे क्या राजनीतिक और वैचारिक संदेश है?

‘महलों में रहने वाले नामदारों’ पर निशाना किसकी ओर?

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में 2010 के दंतेवाड़ा हमले का उल्लेख किया। उस हमले में 76 CRPF जवान शहीद हुए थे। उन्होंने वर्ष 2010 में नागरिकों की हत्या की एक अन्य घटना का भी जिक्र किया। मोदी ने आरोप लगाया कि उस दौर में नक्सली हमले लगातार होते रहे, लेकिन प्रभावशाली राजनीतिक नेतृत्व ने जवानों की शहादत पर वैसी संवेदना नहीं दिखाई, जैसी दिखाई जानी चाहिए थी। ‘महलों में रहने वाले नामदारों की आंखों में आंसू नहीं गिरे’ कहकर उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व पर निशाना साधा।

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यह टिप्पणी केवल सुरक्षा व्यवस्था की चर्चा नहीं थी, बल्कि पिछली सरकारों की नक्सलवाद के खिलाफ नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सीधा हमला भी थी। प्रधानमंत्री ने 2004 से 2013 के बीच सुरक्षा बलों की शहादत के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि कई वर्षों तक मारे गए नक्सलियों की तुलना में शहीद होने वाले जवानों की संख्या अधिक रही। इसके विपरीत उन्होंने पिछले एक वर्ष में ड्यूटी के दौरान किसी CRPF जवान की मृत्यु नहीं होने को सुरक्षा नीति और जवानों के साहस की उपलब्धि बताया।

आखिर कौन हैं ‘दिमागी नक्सली’?

प्रधानमंत्री के भाषण का दूसरा और अधिक व्यापक अर्थ वाला हिस्सा ‘दिमागी नक्सलियों’ से जुड़ा था। मोदी ने कहा कि सशस्त्र नक्सली भले ही जंगलों से समाप्त हो गए हों, लेकिन वैचारिक नक्सली विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों में घुसपैठ कर चुके हैं। उनके अनुसार, ऐसे तत्व संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ लोगों को भड़काने का काम करते हैं। उन्होंने उनकी पहचान करने और उन्हें परास्त करने की अपील की। यहां ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का अर्थ समझना जरूरी है। प्रधानमंत्री ने इस शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया, जिन पर उनका आरोप है कि वे नक्सली विचारधारा को वैचारिक या संगठनात्मक स्तर पर आगे बढ़ाते हैं।

हालांकि, इस शब्द की कोई स्पष्ट कानूनी परिभाषा नहीं बताई गई। न ही प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में ऐसे लोगों या संगठनों के नाम बताए। यही इस बयान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। किसी व्यक्ति या संगठन को केवल सरकार की आलोचना करने, विरोध प्रदर्शन करने या असहमति जताने के आधार पर नक्सली विचारधारा से जुड़ा हुआ नहीं माना जा सकता। हिंसक गतिविधियों, प्रतिबंधित संगठनों से संबंध और लोकतांत्रिक विरोध के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना जरूरी है।

क्या अब नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई का नया चरण शुरू होगा?

प्रधानमंत्री के बयान से संकेत मिलता है कि सरकार नक्सलवाद के खिलाफ अभियान को केवल हथियारबंद हिंसा और जंगलों में सक्रिय सशस्त्र समूहों तक सीमित नहीं देख रही। वह कथित वैचारिक और संगठनात्मक नेटवर्क को भी चुनौती मान रही है। इसके पीछे सरकार का तर्क है कि हिंसक उग्रवाद को समर्थन देने वाली विचारधारा और उसके नेटवर्क को कमजोर किए बिना स्थायी शांति संभव नहीं है।

लेकिन दूसरी ओर एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रश्न भी है—वैचारिक असहमति और हिंसक उग्रवाद के बीच सीमा कौन तय करेगा? क्या सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले, आंदोलन करने वाले या मानवाधिकारों की बात उठाने वाले लोगों को भी इस श्रेणी में रखा जाएगा? इसका जवाब किसी राजनीतिक आरोप से नहीं, बल्कि कानून, प्रमाण और न्यायिक प्रक्रिया से ही तय होना चाहिए।

बस्तर का बदलाव और आगे की असली चुनौती

प्रधानमंत्री ने बस्तर में सुरक्षा बलों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, मोबाइल नेटवर्क, शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हुआ है। उन्होंने बस्तर ओलंपिक का उल्लेख करते हुए कहा कि क्षेत्र के युवा अब खेल और विकास की गतिविधियों में आगे बढ़ रहे हैं। सरकार ने 31 मार्च 2026 को देश में नक्सली हिंसा के अंत और नक्सल प्रभावित जिलों की स्थिति में बदलाव का दावा किया है।

हालांकि, सुरक्षा में सुधार के साथ स्थायी शांति, स्थानीय लोगों का विश्वास, आदिवासी अधिकार, रोजगार और विकास की निरंतरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। बस्तर की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब यहां के लोगों को सुरक्षा के साथ सम्मान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का पूरा अवसर मिले।

असली सवाल: बंदूक के बाद विचारों की लड़ाई या असहमति पर नई बहस?

प्रधानमंत्री का बस्तर संबोधन दो स्पष्ट संदेश देता है। पहला, सरकार नक्सलवाद के खिलाफ सुरक्षा बलों की कार्रवाई को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। दूसरा, अब कथित वैचारिक नक्सलवाद को भी राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती के रूप में देखे जाने की बात कही जा रही है। लेकिन लोकतंत्र में विचारों से मुकाबला विचारों, तथ्यों और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से होना चाहिए। हिंसा और लोकतांत्रिक असहमति को एक ही श्रेणी में रखना गंभीर सवाल पैदा कर सकता है। नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में जवानों का बलिदान देश कभी नहीं भूल सकता। लेकिन लोकतंत्र की मजबूती इस बात से भी तय होगी कि सुरक्षा के नाम पर हिंसा और असहमति के बीच की संवैधानिक रेखा कितनी स्पष्ट रखी जाती है।

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