नई दिल्ली, 05 अगस्त। कोयले की कीमत तय करने का पूरा अधिकार कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) के पास है। कोयला मंत्री प्रल्हाद जोशी ने इसको लेकर कहा है कि कोयले का मूल्य निर्धारित करना सरकार के कार्यक्षेत्र में नहीं है।

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यहां बताना होगा कि कोयले की कीमत बढ़ाने को लेकर कोल इंडिया के समक्ष निरंतर मांग उठती है। कोल सेक्टर के यूनियन का भी इसके लिए दबाव है। सीआईएल के चेयरमैन भी कई मौकों पर कह चुके हैं कि कोयले की कीमत बढ़नी चाहिए, क्योंकि कंपनी की लागत बढ़ चुकी है। कोयला कामगारों के 11वें वेतन समझौते में भी कोयले की कम कीमत एक रोड़ा है। सीआईएल प्रबंधन यूनियन की मांग के हिसाब से एमजीबी तय नहीं कर पा रहा है।

कोयला मंत्री श्री जोशी ने बकायदा संसद में लिखित तौर पर बताया है कि “कोयले के लिए मूल्य निर्धारित करना सरकार के कार्यक्षेत्र में नहीं है। मूल्य निर्धारण कोल इंडिया लिमिटेड का प्रचालनात्मक निर्णय है और सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं है। कोयला कंपनियां इनपुट लागतों मुद्रास्फीति सूचकांक, बाजार के रुझानों के आधार पर कोयले का मूल्य निर्धारित करती हैं।”

हालांकि यह कहा जाता रहा है कि कोल इंडिया लिमिटेड सरकार के दबाव में कोयले की कीमत नहीं बढ़ा रही है। कोयले की कीमत में इजाफा होने से विद्युत, इस्पात, सीमेंट सहित अन्य उद्योग प्रभावित होंगे और वे अपने उत्पादों की कीमत बढ़ा देंगे। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा।

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बताया गया है कि सीआईएल बोर्ड के तमाम सदस्य कम से कम 10- 11 फीसदी तक कोयले की कीमत बढ़ाने के पक्ष में हैं। जानकारी के मुताबिक वर्तमान में कोयले की औसत विनियमित मूल्य (Average Regulated Price) प्राप्ति 1475 रुपए प्रति टन है।

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