नई दिल्ली/कुरनूल। भारत के खनन क्षेत्र में एक नया अध्याय जुड़ गया है। आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले के जोन्नागिरी गांव में देश की पहली बड़ी निजी क्षेत्र की स्वर्ण खदान (Gold Mine) का व्यावसायिक संचालन शुरू हो गया है। इस ऐतिहासिक परियोजना के साथ जोन्नागिरी गांव की पहचान भी बदल गई है और इसे अब ‘स्वर्णगिरी’ के नाम से जाना जाने लगा है।
अब तक देश में सोने का खनन मुख्य रूप से सरकारी एजेंसियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की निगरानी में होता था, लेकिन यह पहली बार है जब बड़े पैमाने पर किसी निजी कंपनी को सोने के खनन का संचालन सौंपा गया है। इससे भारत के खनन उद्योग में निजी निवेश और आधुनिक तकनीक के उपयोग को नई गति मिलने की उम्मीद है।
400 करोड़ रुपये की लागत से विकसित हुई परियोजना
इस स्वर्ण खदान परियोजना को लगभग 400 करोड़ रुपये के निवेश से विकसित किया गया है। यह खदान ओपन-पिट (Open Pit Mining) तकनीक पर आधारित है। यानी भूमिगत सुरंगें बनाने के बजाय जमीन की ऊपरी सतह से बड़े खुले गड्ढे बनाकर अयस्क (Ore) निकाला जाएगा। इसके बाद अत्याधुनिक प्रसंस्करण संयंत्र (Processing Plant) में अयस्क से सोना अलग किया जाएगा।
ओपन-पिट तकनीक अपेक्षाकृत सुरक्षित, कम लागत वाली और बड़े पैमाने पर खनन के लिए अधिक प्रभावी मानी जाती है।
13 टन से अधिक सोने के भंडार की पुष्टि
भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण और विस्तृत ड्रिलिंग के आधार पर इस क्षेत्र में 13 टन से अधिक सोने के भंडार की पुष्टि हो चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यदि अतिरिक्त अन्वेषण (Exploration) सफल रहता है तो कुल भंडार 42 टन तक पहुंच सकता है।
यही कारण है कि जोन्नागिरी परियोजना को भारत के सबसे महत्वपूर्ण स्वर्ण खनन क्षेत्रों में शामिल किया जा रहा है।
पहले साल 400 किलो, बाद में 1 टन सालाना उत्पादन का लक्ष्य
परियोजना के तहत शुरुआती वर्ष में लगभग 400 किलोग्राम सोना निकालने की योजना बनाई गई है। इसके बाद उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा।
अनुमानित उत्पादन इस प्रकार रहेगा
- पहला वर्ष: लगभग 400 किलोग्राम
- अगले चरण: 900 किलोग्राम से 1 टन प्रति वर्ष
- परियोजना की संभावित अवधि: लगभग 15 वर्ष
यदि उत्पादन तय योजना के अनुसार बढ़ता है, तो यह भारत के घरेलू स्वर्ण उत्पादन में उल्लेखनीय योगदान देगा।
आयात पर निर्भरता कम करने में मिलेगी मदद
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में हर वर्ष बड़ी मात्रा में सोने का आयात किया जाता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर भारी खर्च होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जोन्नागिरी जैसी परियोजनाओं के सफल संचालन से
- घरेलू सोना उत्पादन बढ़ेगा।
- आयात पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होगी।
- विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
- खनन क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा।
- स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होगी।
- क्षेत्र के विकास को मिलेगी नई रफ्तार
इस परियोजना से कुरनूल जिले में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है। साथ ही सड़क, बिजली, जलापूर्ति और अन्य आधारभूत सुविधाओं का विकास भी तेज होगा।
खनन उद्योग से जुड़े परिवहन, मशीनरी, रखरखाव, सुरक्षा, इंजीनियरिंग और सेवा क्षेत्रों को भी इसका लाभ मिलेगा।
भारत में स्वर्ण खनन का लंबा इतिहास
भारत प्राचीन काल से ही सोने की समृद्धि के लिए प्रसिद्ध रहा है। वैदिक साहित्य, रामायण और महाभारत में भी स्वर्ण का उल्लेख मिलता है। हालांकि आधुनिक तकनीक के साथ बड़े पैमाने पर स्वर्ण खनन की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान हुई।
कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) ने बदली थी तस्वीर
आधुनिक भारत में सबसे प्रसिद्ध स्वर्ण खदान कर्नाटक की कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) रही है। वर्ष 1880 के आसपास ब्रिटिश कंपनी John Taylor & Sons ने यहां आधुनिक तकनीक से खनन शुरू किया था।
KGF की प्रमुख विशेषताएं
- लगभग 3.2 किलोमीटर गहराई तक खनन
- दुनिया की सबसे गहरी स्वर्ण खदानों में शामिल
- लगभग 120 वर्षों तक संचालन
- 800–900 टन तक सोने का उत्पादन
- एक समय भारत के कुल स्वर्ण उत्पादन का लगभग 95% हिस्सा अकेले KGF से आता था
हालांकि उत्पादन लागत बढ़ने और भंडार घटने के कारण KGF का संचालन बाद में बंद कर दिया गया।
भारतीय खनन क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक कदम
जोन्नागिरी (स्वर्णगिरी) परियोजना केवल एक नई खदान नहीं, बल्कि भारत के खनन क्षेत्र में निजी भागीदारी के नए दौर की शुरुआत मानी जा रही है। यदि यह परियोजना सफल रहती है तो भविष्य में देश के अन्य संभावित स्वर्ण क्षेत्रों में भी निजी निवेश बढ़ सकता है, जिससे भारत का घरेलू स्वर्ण उत्पादन मजबूत होगा और खनन उद्योग को नई दिशा मिलेगी।
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