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नई दिल्ली, 9 जून। कोयला मंत्रालय के अधीन आने वाली कंपनी एनएलसी इंडिया (NLC India) में अपनी 3 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का फैसला लिया है। सरकार इसे ओएफएस (Offer for Sale) के जरिए बेचेगी।

45,523.28 करोड़ रुपये की मार्केट वैल्यू वाली इस कंपनी के 4.16 करोड़ शेयर बाजार में आएंगे। फ्लोर प्राइस 303 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है। इस तरह पूरी तरह बिकने पर सरकार को इससे लगभग 1,200 करोड़ रुपये मिलेंगे। नॉन-रिटेल निवेशकों के लिए बोली मंगलवार, 9 जून से खुली है, जबकि रिटेल निवेशकों के लिए 10 जून (बुधवार) से खुलेगी।

यहां बताना होगा कि NLC India Limited (पूर्व नाम: Neyveli Lignite Corporation Limited) भारत सरकार के कोयला मंत्रालय के अधीन एक प्रमुख नवरत्न सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSU) है। इसकी स्थापना वर्ष 1956 में हुई थी और इसका मुख्यालय नेवेली, तमिलनाडु में स्थित है।

कंपनी ने FY27 के लिए लगभग ₹23,600 करोड़ के निवेश की योजना बनाई है, जिसमें बैटरी ऊर्जा भंडारण (BESS) परियोजनाएँ भी शामिल हैं। NLC India 2030 तक 10 GW से अधिक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विकसित करने के लक्ष्य पर काम कर रही है।

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जानें कैसे मिला था ब्राउन कोल

तमिलनाडु के कुड्डुलूर जिले में एक छोटा-सा गांव था, नेवेली। उस वक्त यह गांव काजू और कटहल के घने जंगलों के लिए जाना जाता था। नेवेली तब एक छोटा गांव था, जिसकी मुख्य पहचान उसके काजू और कटहल के जंगल थे। सिंचाई के लिए एक बोरवेल खोदा जा रहा था। जब बोरवेल खोदा गया, तो पानी के साथ एक काले-भूरे रंग का पदार्थ बाहर आया। उसे लोगों ने पहले “काली मिट्टी” समझा। बाद में पता चला कि यह लिग्नाइट था। लिग्नाइट उत्तेजित करने का एक रूप है। यह साधारण उगाने से कम ऊर्जावान होता है, लेकिन बिजली उत्पादन के लिए काफी उपयोगी होता है। इसे “ब्राउन कोल” भी कहते हैं। और नेवेली की धरती के नीचे इसका विशाल भंडार था। इस पूरे दक्षिण भारतीय तटीय इलाके में ऊर्जा स्रोतों की तलाश काफी समय से चल रही थी। कई जगहों पर कई तरह की चीजें जरूरी थीं, लेकिन मुदालियर की ज़मीन से निकली खोज ने सबका ध्यान खींचा। उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को इस बारे में बताया और नेवेली में लिग्नाइट खनन शुरू कराने की अपील की। ​​उन्होंने 1935 में नए बोरवेल खुदवाए और बड़ी मात्रा में लिग्नाइट निकाला। मद्रास के गवर्नर को नमूने भेजे गए, लेकिन ब्रिटिश उपनिवेशी सरकार को ज्यादा नहीं मिला। हालांकि उसके बाद भी 30 से ज्यादा बोरवेल खोदे गए, जिससे यह पुष्टि हुई कि वहां भरपूर मात्रा में लिग्नाइट मौजूद था।

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